ब्लाग 'गृह-स्वामिनी ' पर पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा था एक कृष्ण भजन ' हँँस हँस के मोहे रिझाये गयो रे ' . जन्माष्टमी के उपलक्ष में साँवरे के सलोने रूप और उनकी लीलाओं को वर्णित करता एक हिन्दी भजन और पढ़ें ....... यदि पसन्द आये तो comment कर के प्रतिक्रिया भी दें. तो प्रस्तुत है एक नया कृष्ण भजन ... तेरा हर रूप है मनोहारी श्री कृष्ण का मनोहारी रूप
जीवन में कठिनाइयां किस पर नहीं पड़ती, पीड़ा सब को झेलनी पड़ती है किन्तु एक रचनाकार या कवि अपनी पीड़ा को कला या कविता में ढाल लेता है . अपने दुःख को कविता या सृजन में बदलने की कला ही किसी भी रचनाकार की ताकत होती है जो मुसीबतों में भी उसे टूटने नहीं देती. जीवन की विषमतायें एक रचनाकार के लिये खुराक के समान होती है जिन्हें अपने सृजन में ढ़ाल वह अपनी रचना को कालजयी बनाता है. यह लेख भी पढ़ें - क्या आपको भी अपना जीवन कठिन लगता है? कैसे बनाये जीवन को आसान यह हिंदी कविता ' कांटों का जंगल' मैंने अपने ऐसे ही अनुभवों के आधार पर लिखी है। आप भले ही कवि ना हो पर यदि कविता को समझते हो तो आपको मेरी बात में सत्यता अवश्य महसूस होगी.