एक प्रश्न नारी के व्यथित अन्तर्मन से.. एक विधवा नारी की व्यथा पर एक कहानी 'अकेली ' के रूप में.... क्या नारी सदा पराधीन और शक के घेरे में ही रहेगी. कभी पिताके, कभी पति के, कभी बेटे के. क्या पढ़ लिख कर और आत्मनिर्भर होते हुए और सारे दायित्व निभाते हुए भी परवशता का एहसास ढ़ोना नारी की शाश्वत नियति बन कर रह गयी है. एक प्रश्न नारी के व्यथित अन्तर्मन से.. एक कहानी 'अकेली ' के रूप में.... नारी विडम्बना पर पढ़ें- कन्या-भ्रूण हत्या कविता मां की कोख में स्थित कन्या-भ्रूण की मां से विनती अकेली उसने सिर उठा कर आकाश की ओर देखा, अचानक ही काले-काले बादल घिर आये थे. तेज बारिश होने की सम्भावना थी. जल्दी-जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ाते हुए उसने सोचा, यह जीवन भी आसमान की तरह ही है. अभी-अभी सब कुछ साफ़, स्पष्ट उजला - उजला सा जीवन, फिर अचानक ही ना जाने कहाँ से विडम्बनाओं के काले-काले बादल आकर जीवन को अंधकार से ढक देते हैं. नियति कभी जीवन- पटल पर इंद्र - धनुषी रंग बिखे...
जीवन में कठिनाइयां किस पर नहीं पड़ती, पीड़ा सब को झेलनी पड़ती है किन्तु एक रचनाकार या कवि अपनी पीड़ा को कला या कविता में ढाल लेता है . अपने दुःख को कविता या सृजन में बदलने की कला ही किसी भी रचनाकार की ताकत होती है जो मुसीबतों में भी उसे टूटने नहीं देती. जीवन की विषमतायें एक रचनाकार के लिये खुराक के समान होती है जिन्हें अपने सृजन में ढ़ाल वह अपनी रचना को कालजयी बनाता है. यह लेख भी पढ़ें - क्या आपको भी अपना जीवन कठिन लगता है? कैसे बनाये जीवन को आसान यह हिंदी कविता ' कांटों का जंगल' मैंने अपने ऐसे ही अनुभवों के आधार पर लिखी है। आप भले ही कवि ना हो पर यदि कविता को समझते हो तो आपको मेरी बात में सत्यता अवश्य महसूस होगी.