श्राद्ध पर्व के दिनों में अपने पूर्वजों का श्राद्ध करना हमारी पुरानी परंपरा है़. ब्राह्मणों और कौवों में अपने पुरखों का रूप मान हम उन्हें श्रद्धा पूर्वक भोजन कराते हैं. बाबा को श्रद्धांजलि यह कविता भी पढ़ें चलिए एक परंपरा हम इस तरह निभा देते हैं मगर क्या इस परंपरा का भाव मात्र यही है कि श्राद्ध वाले दिन अपने पूर्वजों की याद में ब्राह्मणों को भोजन करा कर परंपरा को निभा दिया जाए एक लीक पीटने की तरह.
जीवन में कठिनाइयां किस पर नहीं पड़ती, पीड़ा सब को झेलनी पड़ती है किन्तु एक रचनाकार या कवि अपनी पीड़ा को कला या कविता में ढाल लेता है . अपने दुःख को कविता या सृजन में बदलने की कला ही किसी भी रचनाकार की ताकत होती है जो मुसीबतों में भी उसे टूटने नहीं देती. जीवन की विषमतायें एक रचनाकार के लिये खुराक के समान होती है जिन्हें अपने सृजन में ढ़ाल वह अपनी रचना को कालजयी बनाता है. यह लेख भी पढ़ें - क्या आपको भी अपना जीवन कठिन लगता है? कैसे बनाये जीवन को आसान यह हिंदी कविता ' कांटों का जंगल' मैंने अपने ऐसे ही अनुभवों के आधार पर लिखी है। आप भले ही कवि ना हो पर यदि कविता को समझते हो तो आपको मेरी बात में सत्यता अवश्य महसूस होगी.