लघुकथा- सासूत्व

सासूत्व

लघुकथा-सासुत्व

सास बहू का रिश्ता अपनी तरह का एक अलग ही रिश्ता है -कुछ खट्टा, कुछ मीठा

नयी बहू के लिए नये वातावरण में जितना आत्मीयता और सुरक्षा से भरा, उतना ही डराने वाला भी. वहीं सास के मन में भी बहू के प्रति ममत्व के साथ कुछ अनजानी सी आशंकाओं तथा और भी अनेक विरोधाभासी भावनाओं से पूर्ण होता है यह रिश्ता. इसी सच्चाई को उजागर करती यह छोटी सी लघुकथा- सासूत्व

यहाँ 'सासूत्व ' का अर्थ है सास के 
भीतर का सासपन या कह सकते हैं सास के रिश्ते की  खट्टी-मीठी मूल भावना जो कमोबेश हर सास में पायी जाती है. तो चलिये पढ़ते हैं लघुकथा

सासूत्व

- जा बहू, खाना खा ले. 

- नहीं माँजी, पहले आप खा लें. काम निपटा कर मैं आप के बाद खाऊंगी. 

- नहीं, तू समय से खा ले. किसी हाल से है तू. काम में निपटा दूंगी. ऐसे में भूखे रहने से बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा.

 बहु खाना खाने चली जाती है. इतने में पड़ोसन आती है.

- और बहन क्या हो रहा है? बहु रानी क्या कर रही है? 

- होना क्या है बहन मेरे भाग्य में तो कोल्हू के बैल की तरह खटना ही लिखा है. अरे बच्चे तो हमारे भी हुए थे. हमने तो कभी यह हाल नहीं किया. पूरे दिनों तक काम किया. एक आजकल की बहुएं हैं कि सारा काम सास पर छोड़ पहले खाने को चाहिए. 

दूसरे कमरे में खाना खा रही बहू के हाथ का कौर सास की बात सुनकर हाथ के हाथ में ही रह गया.
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