एक दार्शनिक लघुकथा- जिंदगी और मैं

कम पंक्तियों में ही बड़ी बात, एक पूरा फलसफा बयान करने में सक्षम होती है. ऐसी बात जो व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर दे. लघु कथा 'जिंदगी और मैं' भी कुछ ऐसी ही लघुकथा है ऐसी ही एक लघुकथा प्रस्तुत है..

जिंदगी और मैं

 एक दार्शनिक विचार लघुकथाजिंदगी और मैं के रूप में ...

"जिंदगी और मैं" कविता को प्रदर्शित करता रेखाचित्र

    जिंदगी और मैं
आज सुबह घूमने निकळी तो ऐसा लगा जैसे कोई परछाई  मेरे साथ साथ चल रही है. 
पूछा-- "तू कौन"?

बोली- "मैं, तेरी जिंदगी. किधर जा रही हो तुम"?

मैंने कहा- "मुझे क्या पता, तुम जानो. जिधर ले चलोगी, चली चलूँगी".

ज़िन्दगी पर एक कविता सुने

बड़ी जोर से ठहाका लगा कर हँसी जिन्दगी.

बोली- "ईश्वर ने तुम्हारे हाथ में मेरी डोर दी थी. तुम स्वयं को, स्वयं की शक्ति को भूल अपनी डोर मेरे यानी कि जिंदगी के हाथ में थमा मेरी गुलाम बन गयी.

अब मै तुम्हे अपना मनचाहा नाच नचाती हूँ और तुम पर राज करती हूँ"

यह कह वह परछार्ई ना जाने कहाँ ओझल हो गयी और मैं ठगी सी खडी उसकी बात पर विचार करने को मजबूर हो गयी.
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