लघुकथा- फूल और कांटा

इस मौलिक रचना लघुकथा 'फूल और कांटा' के माध्यम से मैंने फूल और कांटे के वार्तालाप द्वारा यह दर्शाने का प्रयास किया है कि सुन्दरता पर इतराना व्यर्थ हैै. किसी भी व्यक्ति या वस्तु की सुुन्दरता उसके व्यवहार व उपयोगिता से होती है. 
 तो प्रस्तुत है लघुकथा..

फूल और कांटा

लघुकथा-फूल और कांटा

ब्लॉग 'गृह-स्वामिनी' पर 'लघु कथा' के अंतर्गत पढ़िए एक लघु कथा- 'फूल और कांटा'....

वीडियो देखे-'काश गर्म चाय का कप होती जिन्दगी'

फूल ने इतरा कर कांटे से कहा- "तुम्हें संसार में आना ही था तो मेरे जैसा भाग्य लेकर आते. मेरी सुंदरता, मेरी सुगंध,
मेरीे सर्वप्रियता से तुम्हें ईर्ष्या तो बहुत होती होगी. तुम्हारी कुरुपता पर मुझे तो बहुत दया आती है.

कांटा चुपचाप मुस्कराते हुए फूल की बातें सुनता रहा.

तभी फूल को तोड़ने के लिए एक हाथ आगे बढ़ा मगर कांटा चुभते ही वह हाथ दूर हट गया.

डाली से अलग हो बेघर हो जाने के डर से स्तब्ध फूल ने कांटे की और देखा तो वह स्नेह और गर्व मिश्रित मुस्कान लिए उसे ही देख रहा था.

फूल की आंखों से शर्म और कृतज्ञता के आंसू गिर कर कांटे को प्रेम-विभोर कर गए और शूल कह उठा- "रोता क्यों है पगले?  फूल और कांटे का तो जन्म जन्म का साथ है".
---------------

गृह-स्वामिनी पर और लघुकथाएं पढ़ें
पोडकास्ट "मेरी कविता की डायरी" पर सुने कविता "कीर्ति का भय"

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ