काव्य- क्षितिज के पार

काव्य-
क्षितिज के पार 
गृह-स्वामिनी एक सोच पर काव्य के अन्तर्गत  एक गहरी अनुभूतिपूरक कविता (deep poetry) 'क्षितिज के पार'-


मेरी यह कविता प्रतिष्ठित महिला पत्रिका 'मेरी सहेली 'में वर्ष 1998 में प्रकाशित हुई थी. आज यहां उसी कविता को प्रस्तुत करने का मन हो आया. आशा है आपको पसंद आएगी....
शायद
तुम
ठीक कहते हो कि
मैं अभिशप्त हूं
समर्थ होकर भी
असमर्थ हूं
सागर होकर
प्यास हूं
मंजिल होकर भी
 राह हूं
मगर तुम
यह क्यों नहीं समझते कि
जीवन
मेरी दृष्टि में
अभिशाप या वरदान नहीं
कर्तव्य है
युद्ध का मैदान नहीं
धर्म है
मधु-रस का पात्र नहीं
गंगाजल है
राहों की
भूलभुलैया नहीं
आराध्य का
पूजा स्थल है
जिस दिन
तुम्हारी दृष्टि
मेरी दृष्टि से
एकाकार हो जाएगी
मेरे प्रेम को
मिल जाएगी
सार्थकता
क्योंकि तब
तुम्हारे और मेरे बीच का
यह
बुनियादी फर्क मिट जाएगा
कि तुम
देखते हो क्षितिज तक
और मैं देखती हूं
क्षितिज के पार
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