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नारी को परिभाषित करती एक नारीशक्ति कविता- मैं नारी

सतही तौर पर 'नारी' शब्द से जो चित्र उभरता है, नारी की परिभाषा वास्तव में उससे बहुत गहन, बहुत महान है. नारी जहाँ कोमल हृदया है वहीं शक्ति पुंज भी है. सौन्दर्य और शान्ति की मूरत है तो वक्त पड़ने पर चण्डी स्वरूपा भी है.  नारी के ऐसे ही  गरिमामय और सशक्त रूप को व्यक्त करती काव्य पंक्तियां..

मैं नारी

नारीशक्ति पर कविता

मैं नारी हूँ
प्यार बांटती हूं, प्यार लो
मैं कर्तव्य हूं
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो
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मैं पांखुड़ी गुलाब की, मुझे मत मसलो
मैं सौन्दर्य हूँ
उजाले बाँटती हूँ, अँधेरे काट लो

मैं पुलकन हूँ उमंगों सी
मैं धड़कन हूं तरंगों सी
मैं कोमल स्पर्श सी सिहरन,
सुखों को थाम लो
मैं कर्तव्य हूं
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो

मैं कँटीली धार नहीं
मैं तूफानी सिसकार नहीं,
कि जंग ठान लो
मैं अमृतमयी मीठी पावनी गंगा
मैं रस घोलती चाँदनी का चँदा
नहा कर
चाँदनी की गंगधार में, बेड़ा तार लो
मैं कर्तव्य हूँ
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो

मैं शापित नहीं
दुर्वासित वासना के कोप से
रहती हूं तब तलक ही खामोश से
दुश्मन गुजर जाए ना जब तक होश से
कहती हूँ, रोक लो
अपने बढ़ते कदम
वरना मारे जाओगे तुम मेरे प्रतिशोध से

मैं ही दुर्गा, मैं ही काली
नहीं अवगुंठन डाले एक बेचारी
आँखों पर पड़ा पर्दा फाड़ दो
मैं कर्तव्य हूँ
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो

मेरे तन में
उजाले हैं  इतने रातों के
कि देखोगे तो
चौंध कर
मारे जाओगे अपनी आँखों से
क्या टटोलती है
नारी जिस्म में
तुम्हारी निगाहें
क्यों हो गये तुम
तुम्हारी जननी..
नारी के लिए आस्तीन के साँपों से

झटक रही है
अपनी आस्तीनें, अब नारी
नहीं अब नारी अबला बेचारी
क्या होगा हश्र
अब तुम्हारा, कुछ तो विचार लो
मैं कर्तव्य हूँ
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो

अब भी कहती हूं
सौंदर्य है-
पूजा की वस्तु
भरके आँखो में आराधन
हृदय का कोना कोना सँवार लो
मैं कर्तव्य हूँ
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो

मिट्टी है यह तन
मिट्टी ही हो जाना है,
पर खुदा ने भरा इसमें
अपनी बेशकीमती
कारीगरी का खजाना है
सत़्यम् शिवम् सुन्दरम् का
धर ध्यान तुम
ईश्वर की
अनुपम कला को तुम निहार लो
दिखेगी साक्षात अम्बे
तुम्हें हर नारी में,
ममता के लिए
तनिक अपना आँचल तो पसार लो
मैं कर्तव्य हूँ
अधिकार बाँटती हूं, मुझे बांध लो.

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