अपने घर पर दीप जला कर तो सभी दीपावली मना लेते हैं किंतु क्या अपनी खुशियों के बीच में कभी हमें यह ख्याल आता है कि दुनिया में गरीब लोग भी होते हैं जिनके बच्चे सूनी आंखों से औरों को दीपावली मनाते हुए उनकी खुशियां देखते रहते हैं किंतु उनके अपने घर सूने व अंधेरे पड़े रहते हैं. खुशियों के लिए वो तरस जाते हैं.
हम दीपावली के दिन पटाखों पर, रोशनी पर और मिठाइयों पर अपने घर में तो हजारों रुपए फूंक देते हैं किंतु अगर उन पैसों से हम गरीबों की मदद कर दे और उनको भी अपनी खुशियों में शामिल कर ले तो असली दीपावली तो यही है. यही संदेश देती हुई है दीप कविता प्रस्तुत है
दीप कविता
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| दीपावली |
गृह-स्वामिनी पर काव्य के अंतर्गत दीपावली के अवसर पर एक
दीप कविता
दीप का क्या हैकभी भी जला लो
किसी गरीब का
चूल्हा जलाओ
तो दिवाली है
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मिठाई बांटने से
भला क्या होगा
दर्द उनका बांटो
जेब जिनकी
बिल्कुल खाली है
दीप पंक्तियों से
अमावस्या पूर्णिमा सी जगमगाती है
मगर घर में
मगर घर में
अंधेरा हो तो
बाहर की रोशनी
बाहर की रोशनी
कहाँ भाती है
छन कर जाए रोशनी
गरीबों के घर तक
मन में करुणा का
दीप जलाओ
तो दिवाली है
दीपों की माला
का भला क्या
उन सूनी आंखों में
खुशी की लौ जगा लो
तो दिवाली है
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छन कर जाए रोशनी
गरीबों के घर तक
मन में करुणा का
दीप जलाओ
तो दिवाली है
दीपों की माला
का भला क्या
उन सूनी आंखों में
खुशी की लौ जगा लो
तो दिवाली है
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